लखनऊ। शहर का 88 साल पुराना मशहूर इंडियन कॉफी हाउस अब बंद हो गया है। पिछले तीन महीने से यहां ताला लटका हुआ है। कभी यह जगह उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा केंद्र हुआ करती थी। यहां राजनेता, पत्रकार और साहित्यकार घंटों बैठकर चर्चा किया करते थे। मोबाइल फोन के दौर से पहले राजनीतिक खबरें सबसे पहले इसी कॉफी हाउस से निकलती थीं।
दीवारों पर लिखी है यूपी की सियासी कहानी
इस कॉफी हाउस की दीवारें यूपी की बदलती राजनीति की चुपचाप गवाह रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी ने यहां कॉफी पी थी। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने जब अपना कार्यकाल पूरा किए बिना इस्तीफा दिया था, तो सबसे पहले वे इसी कॉफी हाउस पहुंचे थे। मुलायम सिंह यादव भी यहां कॉफी पीने आया करते थे।
यह कॉफी हाउस सिर्फ राजनेताओं का ही नहीं, बल्कि बुद्धिजीवियों, कवियों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और कलाकारों का भी पसंदीदा अड्डा था। एक कप कॉफी के साथ यहां देश-प्रदेश के बड़े मुद्दों पर बातचीत होती थी और नतीजे निकाले जाते थे। यहां कॉफी की कीमत 4 रुपये से शुरू होकर 50 रुपये तक पहुंच गई थी। लेकिन आज यह जगह पूरी तरह सूनी पड़ी है।
ये दिग्गज हस्तियां यहां बैठा करती थीं
इंडियन कॉफी हाउस में पंडित जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, आचार्य नरेंद्र देव, वीर बहादुर सिंह, मुलायम सिंह यादव, अमृत लाल नागर और लालजी टंडन जैसी बड़ी हस्तियां कॉफी की चुस्की लेती थीं। इसके अलावा जनेश्वर मिश्र, राज नारायण, पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी भी यहां का रुख करते थे। साहित्य की बात करें तो यशपाल, मजाज लखनवी, अमृतलाल नागर, मदन मोहन सिद्धू और ठाकुर प्रसाद सिंह जैसे लेखक यहां की महफिल में रौनक लाते थे।
किताब भी लिखी जा चुकी है इस कॉफी हाउस पर
लखनऊ के इस कॉफी हाउस पर लेखक प्रदीप कपूर ने ‘लखनऊ का कॉफी हाउस’ नाम से एक किताब भी लिखी है। प्रदीप कपूर का कहना है कि कॉफी हाउस के करीब तीन महीने से बंद होने की खबर बेहद दुखद है। लंबे समय से इसे चलाने में आर्थिक परेशानियां आ रही थीं। धीरे-धीरे यह संकट और गहरा होता गया।
वे बताते हैं कि 70 और 80 के दशक में यह जगह शहरवालों की पहली पसंद हुआ करती थी। यहां कम पैसों में अच्छी कॉफी मिलती थी और साथ ही अच्छी चर्चाओं में शामिल होने का भी मौका मिलता था।
वीर बहादुर सिंह ने इस्तीफे के बाद सबसे पहले यहीं पी थी कॉफी
लेखक प्रदीप कुमार याद करते हैं कि मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह अक्सर बिना किसी सुरक्षा घेरे के कॉफी हाउस आ जाते थे और आम लोगों के बीच बैठकर कॉफी पीते थे। 1988 में जब उन्होंने इस्तीफा दिया, तो उसके बाद भी वे सबसे पहले कॉफी हाउस पहुंचे और वहां कॉफी पी।
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जब 2002 में लखनऊ आए, तो उन्होंने भी सबसे पहले कॉफी हाउस जाकर कॉफी का आनंद लिया। लालजी टंडन को तो यह जगह बेहद प्रिय थी। जब भी कोई समस्या आती, वे यहीं बैठकर हल निकालते थे। लालजी टंडन ने अपनी राजनीति की शुरुआत भी इसी कॉफी हाउस से की थी। वे अक्सर कहा करते थे—”यह मेरी राजनीति की पाठशाला है और यह पाठशाला चलती रहनी चाहिए।”
पहले भी कई बार बंद हो चुका है कॉफी हाउस
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी बताते हैं कि 1970, 1980 और 1990 के दशक तक कॉफी हाउस शहर का सबसे मजबूत और सम्मानित अड्डा था। उस समय टेलीफोन और मोबाइल फोन बहुत कम थे, इसलिए लोग कॉफी हाउस पहुंचकर शहर भर के लोगों से मिल लेते थे। शहर की तमाम खबरें वहीं मिल जाती थीं।
कॉफी हाउस का एक हिस्सा साहित्यकारों के लिए था और दूसरा राजनेताओं के लिए। सबकी अपनी-अपनी बहस और चर्चा चलती रहती थी। यह कोई आम दुकान नहीं, बल्कि एक सहकारी संस्था थी। इसलिए जब-जब यह बंद हुआ, शहर के लोग इसे खुलवाने के लिए सरकार से गुहार लगाते रहे। कई बार बंद होने के बाद भी लोगों की कोशिशों से यह दोबारा खुला। अब देखना होगा कि इस बार क्या होता है।
‘यूपी की राजनीति यहीं से तय होती थी’
लेखिका नाइश हासन कहती हैं कि कॉफी हाउस उनका सबसे पसंदीदा मीटिंग पॉइंट था। वे बताती हैं कि वहां हमेशा बड़े साहित्यकार और राजनेता बहुत ही आम तरीके से मिल जाते थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि एक जमाने में यूपी की राजनीति इसी कॉफी हाउस से तय होती थी। यह शहर का केंद्र बिंदु होने के साथ-साथ बहुत सस्ती जगह भी थी। वहां मिलना-जुलना बहुत आसान था।
90 के दशक में जब वे सक्रिय हुईं, तो उन्होंने वहां कई बार पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी और रमेश दीक्षित जी को देखा। यह ऐसी जगह थी जहां सभी दलों के लोग जुटते थे, लेकिन कोई मतभेद नहीं होता था। ऐसी ऐतिहासिक धरोहर का बंद होना बेहद अफसोस की बात है। सरकार को इसे बचाने के लिए आगे आना चाहिए।
