यूरोप की नदियां सूखने की कगार पर, अंतरिक्ष से दिखा चौंकाने वाला बदलाव

नई दिल्ली। यूरोप में लगातार पड़ रही भीषण गर्मी और लंबे समय से जारी सूखे का असर अब अंतरिक्ष से भी साफ दिखाई देने लगा है। ताजा सैटेलाइट तस्वीरों में यूरोप की कई बड़ी नदियों का जलस्तर तेजी से घटता नजर आ रहा है। जहां पहले पानी बहता था, वहां अब रेत के बड़े-बड़े टापू और सूखी जमीन दिखाई दे रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है और इसका सबसे बड़ा असर नदियों पर पड़ रहा है।

साल 2025 और 2026 की सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना में ऑस्ट्रिया के वियना के पास बहने वाली डैन्यूब नदी में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। एक साल पहले की तुलना में नदी का जलस्तर काफी नीचे चला गया है और बीच में बने रेत के टापू पहले से कहीं ज्यादा बड़े और स्पष्ट नजर आ रहे हैं।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि यूरोप की दूसरी सबसे लंबी नदी डैन्यूब ने जलस्तर का पुराना रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है। हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में सोमवार को नदी का जलस्तर केवल 4 इंच दर्ज किया गया, जबकि इससे पहले 2018 में 13 इंच का न्यूनतम स्तर रिकॉर्ड किया गया था। मौसम विभाग का अनुमान है कि अगर गर्मी और बढ़ी तो जलस्तर में और गिरावट आ सकती है।

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सूखती डैन्यूब नदी का असर अब बिजली उत्पादन पर भी पड़ने लगा है। रोमानिया के सेरनावोडा परमाणु बिजली संयंत्र तक पर्याप्त पानी पहुंचाने के लिए नौसेना को विस्फोट कर चट्टानें हटानी पड़ीं, ताकि नदी का पानी संयंत्र तक पहुंच सके। इसके अलावा सरकार नदी की एक शाखा में पत्थरों से भरी बार्ज डुबोकर अस्थायी बांध बनाने की तैयारी कर रही है, जिससे अधिक पानी बिजली संयंत्र की ओर मोड़ा जा सके।

हंगरी में भी हालात चिंताजनक हैं। देश के पाक्स परमाणु बिजली संयंत्र, जो हंगरी की लगभग आधी बिजली पैदा करता है, को ठंडा रखने के लिए डैन्यूब नदी के पानी का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन पानी की भारी कमी के कारण संयंत्र के चार रिएक्टरों में से केवल एक ही संचालित हो रहा है और वह भी लगभग 10 प्रतिशत क्षमता पर काम कर रहा है। यदि नदी का जलस्तर और घटा तो संयंत्र के पूरी तरह बंद होने का खतरा पैदा हो सकता है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ते तापमान, कम होती बारिश और जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप के कई देशों में जल संकट गहराता जा रहा है। यदि आने वाले समय में मौसम की स्थिति नहीं बदली तो इसका असर केवल नदियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बिजली उत्पादन, जल आपूर्ति, कृषि और परिवहन जैसी आवश्यक सेवाओं पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

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