IPS की नौकरी ठुकराकर चुनी खेती, इस वैज्ञानिक ने भारत को भूख से आत्मनिर्भर बनाया

नई दिल्ली। भारत में जब लोग भूख और अकाल से जूझ रहे थे, तब एक वैज्ञानिक ने ऐसा फैसला लिया जिसने देश की तस्वीर बदल दी। यह कहानी है भारत की हरित क्रांति के जनक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन की, जिन्होंने आईपीएस जैसी प्रतिष्ठित नौकरी का अवसर छोड़कर खेती और कृषि अनुसंधान का रास्ता चुना। उनके इसी फैसले ने भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की नींव रखी।

7 अगस्त 1925 को तमिलनाडु के कुंबकोणम में जन्मे मनकोम्बु सांबशिवन स्वामीनाथन बचपन से ही समाज की समस्याओं को करीब से देखते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पड़े भीषण अकाल और भुखमरी ने उनके मन पर गहरा असर डाला। उन्होंने तय कर लिया कि जीवन का उद्देश्य देश को भूख से लड़ने में मदद करना होगा।

कृषि विज्ञान की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की परीक्षा भी पास कर ली थी। उनके सामने सुरक्षित और प्रतिष्ठित सरकारी करियर का विकल्प था, लेकिन उन्होंने नौकरी छोड़कर कृषि अनुसंधान को अपना जीवन समर्पित करने का फैसला किया। आगे की पढ़ाई के लिए वह इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए और जेनेटिक्स में शोध किया।

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बाद में उनकी मुलाकात नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. नॉर्मन बोरलॉग से हुई। दोनों ने मिलकर गेहूं और धान की अधिक उत्पादन देने वाली नई किस्मों के विकास पर काम किया। इन नई किस्मों और आधुनिक कृषि तकनीकों ने भारत में हरित क्रांति की शुरुआत की।

1960 के दशक में भारत भीषण खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था। देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए विदेशों से अनाज आयात करना पड़ता था। ऐसे कठिन समय में डॉ. स्वामीनाथन के नेतृत्व में शुरू हुई हरित क्रांति ने खेती की तस्वीर बदल दी। किसानों को बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक खेती का लाभ मिला, जिससे गेहूं और धान का उत्पादन तेजी से बढ़ा। कुछ ही वर्षों में भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बन गया।

डॉ. स्वामीनाथन केवल वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि किसानों के सच्चे हितैषी भी थे। उन्होंने छोटे किसानों, महिलाओं और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के विकास पर विशेष जोर दिया। उन्होंने “एवरग्रीन रिवोल्यूशन” का विचार दिया, जिसमें उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खेती को भी महत्व दिया गया।

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अपने लंबे करियर में उन्हें वर्ल्ड फूड प्राइज, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, पद्म विभूषण सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। उन्हें 80 से अधिक मानद डॉक्टरेट की उपाधियां भी प्रदान की गईं।

28 सितंबर 2023 को डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन का निधन हो गया। वर्ष 2024 में भारत सरकार ने कृषि और किसानों के लिए उनके ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देते हुए उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया।

आज भी डॉ. स्वामीनाथन का जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक व्यक्ति का दूरदर्शी फैसला करोड़ों लोगों का भविष्य बदल सकता है। भारत की खाद्य सुरक्षा और हरित क्रांति की कहानी में उनका नाम हमेशा स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।

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