लखनऊ में 537 स्कूल वाहन चालकों पर केस, बच्चों की सुरक्षा पर सवाल

लखनऊ में स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। मिशन भरोसा पोर्टल पर दर्ज जानकारी के अनुसार राजधानी में स्कूल वाहनों से जुड़े 537 ऐसे चालकों की पहचान की गई है, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक धाराओं में मुकदमे दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इनमें पॉक्सो से लेकर हत्या समेत अन्य गंभीर मामलों से जुड़े मुकदमे शामिल बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसे मामलों की जानकारी पुलिस और परिवहन विभाग तक पहुंचने के बाद संबंधित चालकों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई और बच्चों को ले जाने वाले वाहनों में उनकी मौजूदगी कैसे बनी हुई है।

लखनऊ स्मार्ट सिटी की मिशन भरोसा परियोजना का उद्देश्य स्कूली बच्चों को सुरक्षित परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना है। इस व्यवस्था में स्कूल वाहनों, चालकों और सहायकों का विवरण दर्ज करने के साथ उनके पुलिस सत्यापन और चरित्र संबंधी जानकारी जुटाने की व्यवस्था की गई है। मिशन भरोसा की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक इसका उद्देश्य बच्चों के स्कूल आने-जाने के दौरान सुरक्षित परिवहन सुनिश्चित करना और स्कूल प्रबंधन, अभिभावकों, वाहन मालिकों, चालकों तथा प्रशासन के बीच भरोसे की व्यवस्था बनाना है।

मिशन भरोसा से जुड़े अधिकारियों की ओर से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक लखनऊ में अब तक हजारों स्कूल वाहनों का विवरण पोर्टल पर दर्ज किया जा चुका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 6,183 ऐसे वाहनों का रिकॉर्ड पोर्टल पर दर्ज है, जिनसे स्कूली बच्चों को लाने-ले जाने का काम किया जाता है। इसके अलावा सैकड़ों स्कूलों और हजारों वाहन चालकों का विवरण भी सिस्टम में शामिल किया गया है। इससे यह उम्मीद बनी थी कि बच्चों को स्कूल पहुंचाने वाले ड्राइवरों और वाहनों की पूरी जानकारी एक जगह उपलब्ध होगी और किसी भी संदिग्ध मामले में समय रहते कार्रवाई की जा सकेगी।

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लेकिन 537 चालकों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों की जानकारी सामने आने के बाद व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। खासकर ऐसे मामलों में जिनमें बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े अपराध शामिल हों, वहां केवल रिकॉर्ड तैयार करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि जिस व्यक्ति के हाथ में रोजाना उनके बच्चे की सुरक्षा रहती है, उसका पुलिस सत्यापन और आपराधिक इतिहास स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए।

मिशन भरोसा से जुड़ी पिछली समीक्षा में भी स्कूली वाहन चालकों के चरित्र सत्यापन में आपराधिक पृष्ठभूमि सामने आने की जानकारी दी गई थी। अगस्त 2025 में अधिकारियों ने बताया था कि 500 से अधिक चालकों के सत्यापन में आपराधिक प्रवृत्ति सामने आई थी और ऐसे चालकों के प्रमाणपत्र रोकने की बात कही गई थी। अधिकारियों ने यह भी कहा था कि बिना चरित्र सत्यापन के किसी चालक को स्कूली वाहन चलाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।

इससे साफ है कि स्कूली वाहन चालकों की पृष्ठभूमि को लेकर चिंता नई नहीं है। इससे पहले भी लखनऊ में स्कूली वाहन चालकों के खिलाफ हत्या, दंगे और अन्य गंभीर अपराधों के मामले दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आ चुकी है। गलत पते और अधूरे सत्यापन के मामले भी सामने आए हैं। ऐसे में अब जरूरत केवल आंकड़े जुटाने की नहीं, बल्कि सत्यापन के बाद कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की है।

स्कूली वाहनों को लेकर समस्या केवल ड्राइवरों के आपराधिक रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। मिशन भरोसा के आंकड़ों में वाहनों के सत्यापन और सुरक्षा मानकों से जुड़े कई पहलू भी सामने आते हैं। नियमों के अनुसार स्कूली वाहनों में सीसीटीवी कैमरा, लाइव ट्रैकिंग डिवाइस, सुरक्षा रॉड और निर्धारित रंग जैसी व्यवस्थाएं होनी चाहिए। इसके बावजूद कई वाहनों में जरूरी सुरक्षा सुविधाओं की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं।

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एक अन्य चिंता यह भी है कि पोर्टल पर दर्ज कई चालकों के पते गलत पाए गए हैं। ऐसे आवेदनों को रिजेक्ट किए जाने की जानकारी दी गई है। लेकिन गलत पता देने वाले व्यक्ति की पहचान सामने आने के बाद उसके खिलाफ आगे क्या कार्रवाई हुई, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। यदि किसी चालक का पता ही सत्यापित नहीं हो पा रहा है, तो उसे बच्चों के परिवहन की जिम्मेदारी देना सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमजोरी मानी जा सकती है।

लखनऊ में मिशन भरोसा की शुरुआत इसी उद्देश्य से की गई थी कि अभिभावक अपने बच्चे को स्कूल भेजते समय वाहन और चालक की जानकारी पर भरोसा कर सकें। आधिकारिक पोर्टल पर नागरिकों को स्कूल वाहन की स्थिति या चालक द्वारा नियमों के उल्लंघन की जानकारी वाहन नंबर के साथ देने की सुविधा भी उपलब्ध है। अभिभावक स्कूल का नाम और संबंधित जानकारी देकर शिकायत दर्ज करा सकते हैं तथा फोटो भी अपलोड कर सकते हैं।

अभिभावकों के लिए यह सुविधा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई बच्चे स्कूल की ओर से उपलब्ध वाहन के बजाय निजी ऑटो, वैन या अन्य साधनों से स्कूल आते-जाते हैं। ऐसे वाहनों में सुरक्षा मानकों की स्थिति और चालक की पृष्ठभूमि की जानकारी परिवारों के पास हमेशा नहीं होती। विशेषज्ञों और अधिकारियों की ओर से भी समय-समय पर अभिभावकों से अपील की जाती रही है कि वे बच्चों को किसी भी वाहन में भेजने से पहले वाहन नंबर, चालक का नाम, मोबाइल नंबर और सत्यापन की स्थिति जरूर जांचें।

फरवरी 2026 में लखनऊ में विद्यालय परिवहन सुरक्षा से जुड़ी बैठक में भी अनफिट वाहनों और अनाड़ी चालकों को चिह्नित करने के निर्देश दिए गए थे। अधिकारियों ने स्कूलों को वाहन संबंधी जानकारी मिशन भरोसा में दर्ज कराने को कहा था। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासनिक स्तर पर स्कूली परिवहन व्यवस्था को व्यवस्थित करने की कोशिश जारी है, लेकिन बड़ी संख्या में वाहनों और चालकों के कारण निगरानी की चुनौती अब भी बनी हुई है।

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अब 537 चालकों से जुड़े नए आंकड़े सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल कार्रवाई का है। यदि किसी चालक के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज है तो उसके मामले की प्रकृति, वर्तमान कानूनी स्थिति और पुलिस सत्यापन के आधार पर यह तय होना चाहिए कि वह बच्चों के परिवहन के लिए उपयुक्त है या नहीं। केवल मुकदमा दर्ज होना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए ऐसे मामलों की जांच और जोखिम का आकलन बेहद जरूरी है।

स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। बच्चों को लाने-ले जाने वाले हर वाहन का रिकॉर्ड, चालक का सत्यापन, वाहन की फिटनेस और सुरक्षा उपकरणों की नियमित जांच होनी चाहिए। अभिभावकों को भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि स्कूल से जुड़ा हर वाहन अपने आप सुरक्षित है। मिशन भरोसा का उद्देश्य भी इसी व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है।

लखनऊ में हजारों बच्चे रोजाना स्कूल वाहनों के जरिए सफर करते हैं। उनके लिए ड्राइवर केवल वाहन चलाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि स्कूल और घर के बीच सुरक्षा की महत्वपूर्ण कड़ी होता है। इसलिए 537 चालकों से जुड़े गंभीर मामलों की जानकारी को केवल एक आंकड़े के रूप में नहीं देखा जा सकता। पुलिस, परिवहन विभाग, स्कूल प्रबंधन और मिशन भरोसा को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि सत्यापन में सामने आने वाली हर गंभीर आपत्ति पर समयबद्ध कार्रवाई हो और किसी भी बच्चे की सुरक्षा से समझौता न हो।

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