आज के इस दौर में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का बेहद अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन कम उम्र के बच्चों के हाथों में इसका होना एक बड़ी फिक्र का सबब भी बनता जा रहा है। दिन-रात स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखने से नई नस्ल का जो नुकसान हो रहा है, उसे देखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार अब एक बड़ा और कुछ हद तक सख्त कदम उठाने जा रही है। सूबे के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस बात के साफ संकेत दिए हैं कि राज्य सरकार जल्द ही स्कूली बच्चों को मोबाइल फोन खरीदने के लिए दी जाने वाली माली मदद यानी आर्थिक सहायता को बंद कर सकती है। इसकी जगह सरकार बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एजुकेशन टैबलेट खरीदने के लिए ग्रांट देने की तैयारी कर रही है। यह फैसला इस बात का सबूत है कि सरकार डिजिटल तालीम को तो बढ़ावा देना चाहती है, लेकिन साथ ही बच्चों को स्मार्टफोन की वजह से होने वाले भटकाव से भी महफूज रखना चाहती है।
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो यह अहम ऐलान हावड़ा के बेंट्रा में आयोजित एक खास सरकारी कार्यक्रम के दौरान किया गया। मौका था सारथी योजना की शानदार शुरुआत का, जिसके तहत सरकार स्कूली छात्र-छात्राओं को साइकिलें बांट रही है। आपको बता दें कि यह नई सारथी योजना दरअसल पिछली टीएमसी सरकार की सबुज साथी योजना की जगह लाई गई है। इस कार्यक्रम के भरे मंच से बोलते हुए मुख्यमंत्री ने बिल्कुल बेबाक लफ्जों में अपनी बात रखी। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वह स्कूलों में बच्चों के मोबाइल फोन इस्तेमाल करने के सख्त खिलाफ हैं। यह उनके भविष्य को ऐसा नुकसान पहुंचा रहा है जिसकी कभी भरपाई नहीं की जा सकती। हम इस पूरे मसले पर बहुत संजीदगी से सोच-विचार कर रहे हैं। इस अहम मौके पर स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन और उच्च शिक्षा मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय भी मंच पर मौजूद थे, जिन्हें सीधे तौर पर इस नई पॉलिसी का खाका तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया है।
पुरानी व्यवस्था का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री अधिकारी ने याद दिलाया कि कैसे पिछली सरकार हर साल जनवरी के महीने में 11वीं क्लास के बच्चों को मोबाइल फोन खरीदने के लिए 10 हजार रुपये की नकद मदद दिया करती थी। अब इस सिस्टम को पूरी तरह से बदलने का वक्त आ गया है। उन्होंने बताया कि इस बाबत राज्य के शिक्षा सचिव को पहले ही निर्देश दिए जा चुके हैं कि वो इस माली मदद के तरीके को बदलने के विकल्पों पर गौर करें। सरकार की नई और साफ सोच यह है कि आम फोन के बजाय बच्चों के हाथों में ऐसे खास एजुकेशन टैबलेट दिए जाएं जो सिर्फ और सिर्फ उनकी पढ़ाई के काम आएं। मुख्यमंत्री ने यहां तक कहा कि अगर इन एजुकेशन टैबलेट को खरीदने के लिए 10 हजार रुपये से ज्यादा की रकम भी देनी पड़ी, तो भी सरकार पीछे नहीं हटेगी और बच्चों के बेहतर मुस्तकबिल के लिए यह खर्च उठाएगी। आखिर स्मार्टफोन की जगह टैबलेट ही क्यों? इस सवाल का जवाब उस नुकसान में छिपा है जिसका जिक्र मुख्यमंत्री ने किया। स्मार्टफोन में आमतौर पर सोशल मीडिया, गेमिंग और एंटरटेनमेंट ऐप्स की भरमार होती है, जो बच्चों का ध्यान पढ़ाई से हटाकर स्क्रीन की लत की तरफ धकेलते हैं। वहीं एजुकेशन टैबलेट को खास तौर पर ई-बुक्स पढ़ने, ऑनलाइन क्लास लेने और स्टडी मटेरियल सेव करने के हिसाब से डिजाइन किया जाता है। इसकी स्क्रीन बड़ी होने के कारण बच्चों की आंखों पर भी कम जोर पड़ता है।
