नई दिल्ली/इस्लामाबाद। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होरमुज़ जलडमरूमध्य में बार-बार पैदा हो रही अनिश्चितता ने पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कभी धीमी रफ्तार और सीमित कारोबारी गतिविधियों के कारण आलोचना झेलने वाला यह बंदरगाह अब क्षेत्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स के लिहाज से अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान सही रणनीति अपनाता है तो ग्वादर आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया का बड़ा आर्थिक और ऊर्जा केंद्र बन सकता है।
होरमुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और आपूर्ति पर सीधा असर पड़ता है। हालिया संकट के दौरान वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों की आवश्यकता महसूस की गई, जिससे ग्वादर पोर्ट की रणनीतिक उपयोगिता और बढ़ गई।
विशेषज्ञों के अनुसार पाकिस्तान और ईरान के बीच मौजूद सड़क संपर्क तथा ग्वादर से ईरान के रिमदान बॉर्डर तक का मार्ग क्षेत्रीय माल परिवहन के लिए एक विकल्प बनकर उभरा। इससे पहली बार ग्वादर को केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि क्षेत्रीय लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जाने लगा।
ग्वादर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। करीब 62 अरब डॉलर की इस परियोजना का उद्देश्य चीन के काशगर शहर को अरब सागर से जोड़ना है। यह चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) की प्रमुख परियोजनाओं में भी शामिल है। बंदरगाह के साथ आधुनिक एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे, विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) और औद्योगिक ढांचे का भी विकास किया जा रहा है।
हालांकि, परियोजना शुरू होने के वर्षों बाद भी ग्वादर अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाया। सुरक्षा चुनौतियां, सीमित निवेश और औद्योगिक विकास की धीमी गति इसकी प्रमुख वजहें मानी जाती हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े समुद्री बंदरगाहों को पूरी तरह विकसित होने में कई दशक लगते हैं और ग्वादर के भविष्य का आकलन अभी जल्दबाजी होगी।
ग्वादर को लेकर सबसे चर्चित योजनाओं में ‘ऑयल सिटी’ परियोजना शामिल है। प्रस्ताव के अनुसार यहां बड़े पैमाने पर तेल भंडारण केंद्र, रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल उद्योग विकसित किए जा सकते हैं। सऊदी अरब ने भी इस परियोजना में रुचि दिखाई है। यदि यह योजना सफल होती है तो पाकिस्तान न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर सकेगा, बल्कि मध्य एशिया, चीन और दक्षिण एशिया के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा वितरण केंद्र भी बन सकता है।
दूसरी ओर, कई ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य केवल तेल का नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा का है। उनका सुझाव है कि ग्वादर की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर यहां बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा, बैटरी निर्माण और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग विकसित किए जा सकते हैं। इससे आयातित ईंधन पर निर्भरता कम होगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
सरकार ग्वादर के विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) में निवेश आकर्षित करने के लिए लंबी अवधि की लीज, कर छूट और आधुनिक बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है। उद्देश्य यह है कि यहां निर्यात आधारित उद्योग स्थापित हों और विदेशी निवेश बढ़े।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ग्वादर की सबसे बड़ी चुनौती अब भी सुरक्षा और निवेशकों का भरोसा है। बलूचिस्तान में लंबे समय से सुरक्षा संबंधी समस्याएं रही हैं। ऐसे में केवल बंदरगाह का विस्तार पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय लोगों की भागीदारी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और मजबूत कानून-व्यवस्था भी इस परियोजना की सफलता के लिए जरूरी होगी।
होरमुज़ संकट ने यह संकेत दिया है कि वैश्विक व्यापारिक मार्ग भू-राजनीतिक तनाव से कभी भी प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में ग्वादर पाकिस्तान के लिए केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, क्षेत्रीय संपर्क और ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा अवसर बनकर उभर सकता है। अब यह पाकिस्तान की नीतियों, निवेश और दीर्घकालिक रणनीति पर निर्भर करेगा कि ग्वादर भविष्य में एक सफल वैश्विक व्यापारिक केंद्र बनता है या फिर अधूरी महत्वाकांक्षा बनकर रह जाता है।
