मुगलकालीन बेगमों से शुरू हुई परंपरा
स्थानीय बुजुर्ग महिलाओं और गांव के लोगों के अनुसार, इस अनोखी रस्म की शुरुआत करीब दो शताब्दी पहले मुगल या नवाबी काल में हुई थी। मान्यता है कि बेगम नूरजहां और कमरजहां ने नागपंचमी के अगले दिन महिलाओं की कुश्ती कराने की परंपरा शुरू की थी। उस समय महिलाओं को समाज में खुलकर अपनी ताकत दिखाने का मौका कम मिलता था। इन बेगमों ने महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाने के उद्देश्य से इस दंगल की नींव रखी। पहले विजेता महिलाओं को सोने के सिक्के और हारने वाली महिलाओं को चांदी के सिक्के दिए जाते थे। आज भी गांव की कुछ बुजुर्ग महिलाओं के पास उन पुराने सिक्कों और प्रतीकों के अवशेष मौजूद हैं, जो इस परंपरा की गवाही देते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार अहिमामऊ गांव अवध के नवाबों से जुड़ा रहा है। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यह परंपरा नवाब वाजिद अली शाह के समय के मंत्री मीर वाजिद अली से भी जुड़ी हो सकती है, लेकिन गांव की महिलाओं में बेगम नूरजहां वाली कहानी ज्यादा प्रचलित है। चाहे शुरूआत किसी भी शासक काल से हुई हो, महत्वपूर्ण बात यह है कि यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना रुके चली आ रही है।
कैसे होता है ‘हापा’ दंगल?
हर साल नागपंचमी के अगले दिन दोपहर बाद अहिमामऊ के अखाड़े में माहौल बदल जाता है। महिलाएं पहले देवी-देवताओं की पूजा करती हैं। रीछ देवी, गूंगी देवी, दुर्गा और भुईया देवी की आराधना के साथ दंगल की शुरुआत होती है। टोकरी में फल, बताशे, श्रृंगार का सामान और खिलौने रखे जाते हैं। ढोलक और मंजीरे की थाप पर देवी गीत गूंजने लगते हैं। कुछ गीतों में ग्रामीण लोक भाषा और जोरदार ललकार भी शामिल होती है।इसके बाद महिलाएं साड़ी बांधकर अखाड़े में उतरती हैं। उम्र का कोई बंधन नहीं होता। 20 साल की युवा बहुएं भी भाग लेती हैं और 65 से 90 साल की बुजुर्ग महिलाएं भी। कई बार सास-बहू एक-दूसरे के खिलाफ भी कुश्ती लड़ लेती हैं। कोई प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं होती। सिर्फ हिम्मत, फुर्ती और परंपरा के प्रति समर्पण होता है। पांच राउंड की कुश्ती होती है। जीतने वाली को साड़ी या नकद इनाम मिलता है, जबकि हारने वाली को भी छोटा सा उपहार दिया जाता है। गांव की महिलाओं का कहना है कि इसमें हार-जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण परंपरा को जिंदा रखना है।सबसे खास बात यह है कि दंगल के दौरान पुरुषों का प्रवेश सख्त मना है। यहां तक कि छोटे लड़कों को भी अखाड़े के पास नहीं आने दिया जाता। पुलिस और गांव की महिलाएं मिलकर इस नियम का पालन सुनिश्चित करती हैं। कई पुरुष छतों और खिड़कियों से चुपके से देखते हैं, लेकिन मैदान में उनका आना पूरी तरह प्रतिबंधित रहता है।
इस साल का दंगल भी जोश से भरा रहा
18 अगस्त 2026 को भी अहिमामऊ में यह परंपरा पूरे उत्साह के साथ निभाई गई। सुल्तानपुर रोड स्थित गोसाईंगंज के अहिमामऊ में महिलाओं ने साड़ी पहनकर अखाड़े में दमखम दिखाया। पहले मुकाबले में 65 वर्षीय विनय कुमारी ने 40 साल की पुच्ची को पटकनी दी। विनय कुमारी पिछले कई सालों से इस आयोजन को संगठित करती आ रही हैं। गांव की महिलाओं ने बताया कि इस बार भी ढोलक की थाप पर देवी गीत गूंजे और कई बुजुर्ग महिलाओं ने युवाओं जैसी फुर्ती दिखाई।स्थानीय लोग बताते हैं कि इस दंगल को देखकर लगता है जैसे समय रुक गया हो। आधुनिक दुनिया में जहां सब कुछ बदल रहा है, अहिमामऊ की महिलाएं अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। वे न सिर्फ परंपरा निभा रही हैं, बल्कि महिलाओं की ताकत का संदेश भी दे रही हैं।
